आइए हम भी महावीर बनने की तैयारी करें – गणि राजेंद्र विजय

आइए हम भी महावीर बनने की तैयारी करें – गणि राजेंद्र विजय

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सदियों पहले महावीर जन्मे। वे जन्म से महावीर नहीं थे। अनगिनत संघर्षों को झेला, कष्ट सहे, दुख में से सुख खोजा और तब कठिन तप एवं साधना के बल पर सत्य तक पहुंचे। उन्होंने समझ दी कि महानता कभी भौतिक पदार्थों, सुख-सुविधाओं, संकीर्ण सोच और स्वार्थी मनोवृत्ति से नहीं प्राप्त की जा सकती। उसके लिए सचाई को बटोरना होता है, नैतिकता के पथ पर चलना होता है और अहिंसा की जीवन शैली अपनानी होती है। प्रत्येक वर्ष भगवान महावीर की जन्म जयंती हम मनाते हैं। इस दिन भगवान महावीर की शिक्षाओं पर गोष्ठियां होती हैं, भाषण होते हैं और कई प्रकार के कार्यक्रम आयोजित होते हैं। लेकिन इन शिक्षाओं का हमारे व्यावहारिक जीवन में किस प्रकार समावेश हो, यह जानना अधिक जरूरी है, जिस पर प्राय: सन्नाटा ही देखने को मिलता है। ज्यादातर महावीर जयंती आयोजनात्मक होती है, प्रयोजनात्मक नहीं हो पाती। हम महावीर को केवल पूजते हैं, जीवन में धारण नहीं कर पाते। हम केवल कर्मकांड और पूजा विधि में ही लगे रहते हैं और जो मूल शिक्षाएं हैं, उन्हें जीवन में नहीं उतार पाते। आज मनुष्य जिन समस्याओं से घिरा है, उन सबका समाधान महावीर के दर्शन और सिद्धांतों में समाहित है। जरूरी है कि हम में से हर व्यक्ति महावीर बनने की तैयारी करे, तभी समस्याओं से मुक्ति पाई जा सकती है। महावीर वही व्यक्ति बन सकता है, जो लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पित हो, जिसमें कष्टों को सहने की क्षमता हो। जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी संतुलन बनाए रख सके। जिसके मन में सभी प्राणियों के लिए सहअस्तित्व की भावना हो। जो पुरुषार्थ के द्वारा अपना भाग्य बदलना जानता हो। भगवान महावीर की मूल शिक्षा है- अहिंसा। अहिंसा का सीधा अर्थ यह है कि व्यावहारिक जीवन में हम किसी को कष्ट नहीं पहुंचाएं, किसी प्राणी को अपने स्वार्थ के लिए दुख न दें। दूसरे व्यक्तियों से ऐसा व्यवहार करें जैसा कि हम उनसे अपने लिए अपेक्षा करते हैं। महावीर का दूसरा व्यावहारिक संदेश है- क्षमा। उन्होंने कहा कि मैं सभी से क्षमा याचना करता हूं। मुझे सभी क्षमा करें। मेरे लिए सभी प्राणी मित्रवत हैं। मेरा किसी से भी वैर नहीं है। व्यावहारिक जीवन में यह आवश्यक है कि हम अहंकार को मिटाकर शुद्ध हृदय से बार-बार ऐसी क्षमा प्रदान करें। भगवान महावीर आदमी को उपदेश देते हैं कि धर्म का सही अर्थ समझो। धर्म तुम्हें सुख, शांति, समृद्धि, समाधि -यह सब आज देता है या बाद में -इसका मूल्य नहीं है। मूल्य इस बात का है कि धर्म तुम्हें समता, पवित्रता, नैतिकता और अहिंसा की अनुभूति कराता है या नहीं। महावीर का जीवन हमारे लिए इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसमें धर्म के सूत्र निहित हैं। आज महावीर के पुनर्जन्म की नहीं, बल्कि उनके द्वारा जीये गए मूल्यों के पुनर्जन्म की अपेक्षा है। जरूरत है हम बदलें, हमारा स्वभाव बदले और हम हर क्षण महावीर बनने की तैयारी में जुटें, तभी महावीर जयंती मनाना सार्थक होगा। महावीर बनने की कसौटी है- देश और काल से निरपेक्ष तथा जाति और संप्रदाय की कारा से मुक्त चेतना का आविर्भाव। भगवान महावीर एक कालजयी और असांप्रदायिक महापुरुष थे, जिन्होंने अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत को तीव्रता से जीया। वे इस त्रिपदी के न केवल प्रयोक्ता थे, बल्कि प्रणेता भी। पदार्थ के अभाव से उत्पन्न दुख को सद्भाव से मिटाया जा सकता है, श्रम से मिटाया जा सकता है, किंतु पदार्थ की आसक्ति से उत्पन्न दुख को कैसे मिटाया जाए? महावीर ने कहा, असंचय से। जीव बलवान है या कर्म -महावीर ने कहा कि अप्रमत्तता की साधना से जीव बलवान बना रहता है और प्रमाद से कर्म। जीव का सोना अच्छा है या जागरण -महावीर ने कहा कि पाप में प्रवृत्त जीवों का सोना अच्छा है और धर्म परायण जीवों का जागरण। इस तरह भगवान ने प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों का समर्थन किया।