क्षमा गर कर गए तो आप महावीर बन गए

क्षमा गर कर गए तो आप महावीर बन गए

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सदियों पहले महावीर जन्मे। वे जन्म से महावीर नहीं थे। अनगिनत संघर्षों को झेला, कष्ट सहे, दुख में से सुख खोजा और तब कठिन तप एवं साधना के बल पर सत्य तक पहुंचे। उन्होंने समझ दी कि महानता कभी भौतिक पदार्थों, सुख-सुविधाओं, संकीर्ण सोच और स्वार्थी मनोवृत्ति से नहीं प्राप्त की जा सकती। उसके लिए सच्चाई को बटोरना होता है, नैतिकता के पथ पर चलना होता है। हम महावीर को केवल पूजते हैं, जीवन में धारण नहीं कर पाते। हम केवल कर्मकांड और पूजा विधि में ही लगे रहते हैं और जो मूल शिक्षाएं हैं, उन्हें जीवन में नहीं उतार पाते। आज मनुष्य जिन समस्याओं से घिरा है, उन सबका समाधान महावीर के दर्शन और सिद्धांतों में समाहित है। महावीर वही व्यक्ति बन सकता है, जो लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पित हो, जिसमें कष्टों को सहने की क्षमता हो। जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी संतुलन बनाए रख सके। जिसके मन में सभी प्राणियों के लिए सहअस्तित्व की भावना हो। जो पुरुषार्थ के द्वारा अपना भाग्य बदलना जानता हो। महावीर का दूसरा व्यावहारिक संदेश है- क्षमा। उन्होंने कहा कि मैं सभी से क्षमा याचना करता हूं। मुझे सभी क्षमा करें। मेरे लिए सभी प्राणी मित्रवत हैं। मेरा किसी से भी वैर नहीं है। व्यावहारिक जीवन में यह आवश्यक है कि हम अहंकार को मिटाकर शुद्ध हृदय से बार-बार ऐसी क्षमा प्रदान करें। भगवान महावीर आदमी को उपदेश देते हैं कि धर्म का सही अर्थ समझो। धर्म तुम्हें सुख, शांति, समृद्धि, समाधि -यह सब आज देता है या बाद में -इसका मूल्य नहीं है। मूल्य इस बात का है कि धर्म तुम्हें समता, पवित्रता, नैतिकता और अहिंसा की अनुभूति कराता है या नहीं। महावीर का जीवन हमारे लिए इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसमें धर्म के सूत्र निहित हैं। आज महावीर के पुनर्जन्म की नहीं, बल्कि उनके द्वारा जीये गए मूल्यों के पुनर्जन्म की अपेक्षा है। जरूरत है हम बदलें, हमारा स्वभाव बदले और हम हर क्षण महावीर बनने की तैयारी में जुटें, तभी महावीर जयंती मनाना सार्थक होगा। महावीर बनने की कसौटी है- देश और काल से निरपेक्ष तथा जाति और संप्रदाय की कारा से मुक्त चेतना का आविर्भाव। भगवान महावीर एक कालजयी और असांप्रदायिक महापुरुष थे, जिन्होंने अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत को तीव्रता से जीया।