अहिंसा बने सबके जीवन का आदर्श – आचार्य तुलसी

अहिंसा बने सबके जीवन का आदर्श – आचार्य तुलसी

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मनुष्य सुख का इच्छुक है। वह सुख से जीना चाहता है। उसके सुख में किसी प्रकार की बाधा पहुंचती है तो वह बेचैन हो जाता है। सुख के लिए इतनी गहरी तड़प होने पर भी वह कष्टों से घिर जाता है, क्योंकि सुख का अमोघ साधन है- अहिंसा। जब तक अहिंसा की चेतना नहीं जागती, अल्प मात्र में जागती है, तब तक व्यक्ति हिंसा के सहारे चलता है। हिंसा एक प्रकार का उद्वेग है। उद्वेग के रहते सुख-शांति या आनंद का अनुभव नहीं हो सकता, इसलिए उद्वेग मूलक प्रवृत्ति से बचाव जरूरी है। हिंसा जीवन का एक खतरनाक मोड़ है। इस मोड़ पर घुमाव है, फिसलन है और अंधेरा है। घुमावदार मोड़ों पर प्रकाश की समुचित व्यवस्था हो और ट्रैफिक पुलिस सावधान हो तो दुर्घटनाएं कम होती हैं। अहिंसा का रास्ता कुछ लंबा अवश्य है, पर वहां न तो कोई खतरनाक मोड़ है, न फिसलन है और न अंधकार। ऐसे रास्ते पर व्यक्ति निश्चिंतता के साथ आगे बढ़ता है और समय से पहले ही मंजिल तक पहुंच जाता है। अहिंसा के दो अंग हैं- सापेक्षता और सहअस्तित्व। इनका सृष्टा है अनेकांत। आज संसार एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां से आगे बढऩे के लिए उसे अनेकांत की जरूरत है। किसी भी व्यक्ति, वस्तु या घटना को भिन्न-भिन्न दृष्टियों से देखना और विरोधी युगलों में समन्वय स्थापित करना- यह अनेकांत है। यही सापेक्षता और सहअस्तित्व का आधार है। अनेकांत की बैसाखी के सहारे मनुष्य शांति की दिशा में प्रस्थान कर सकता है और शांति से जीवन-यापन कर सकता है।

अनेकांत नहीं समझा गया तो किसी भी समय विश्व-युद्ध भडक़ सकता है। अहिंसा के दो रूप हैं- आचारात्मक और विचारात्मक। हत्या न करना, दुख न देना आदि अहिंसा का आचारात्मक पक्ष है। विचारात्मक अहिंसा इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। विचारों में उतर कर ही अहिंसा या हिंसा को सक्रिय होने का अवसर मिलता है। वैचारिक हिंसा अधिक भयावह है। विचारों की शक्ति की थाह पाना बहुत मुश्किल है। जिन लोगों ने इसमें थोड़ा भी अवगाहन किया है, वे विचार-चिकित्सा नाम से नई चिकित्सा विधि का प्रयोग कर रहे हैं। इस विधि में हिंसा, भय, निराशा जैसे नकारात्मक विचारों का कोई स्थान नहीं। अहिंसा एकमात्र सकारात्मक चिंतन पर खड़ी है। सकारात्मक चिंतन अनेकांत की उर्वरा में ही पैदा हो सकता है। अनेकांत के बिना विश्वशांति की कल्पना हो ही नहीं सकती। शांति का दूसरा बड़ा कारण है- त्याग की चेतना के विकास का प्रशिक्षण। भोगवादी वृत्ति से हिंसा को प्रोत्साहन मिलता है। यदि व्यक्ति को शांति से जीना है तो उसे त्याग की महिमा को स्वीकार करना होगा, त्याग की चेतना का विकास करना होगा।

आचार्य भिक्षु ने सब प्रकार के उपचारों से ऊपर उठ कर साफ शब्दों में कहा- ‘त्याग धर्म है, भोग नहीं। संयम धर्म है, असंयम नहीं। भगवान की आज्ञा धर्म है। यह वैचारिक आस्था व्यक्ति में अहिंसा की लौ प्रज्ज्वलित कर सकती है। बात विश्वशांति की हो और विचारों में घोर अशांति व्याप्त हो तो शांति किस दरवाजे से भीतर प्रवेश करेगी? एक ओर शांति पर चर्चा, दूसरी ओर घोर प्रलयंकारी अणु अस्त्रों का निर्माण! क्या यह विसंगति नहीं है? ऐसी विसंगतियां तभी टूट सकेंगी, जब अणु अस्त्रों के प्रयोग पर नियंत्रण हो जाएगा। जिस प्रकार पानी मथने से घी नहीं मिलता, वैसे ही हिंसा से शांति नहीं होती। शांति के सारे रहस्य अहिंसा के पास हैं। मैं ऐसा मानता हूं कि अहिंसा से बढ़ कर कोई शस्त्र ही नहीं है। काश! उस शस्त्र की शक्ति और प्रयोगविधि से मनुष्य परिचित होता। आवश्यकता है इस संदर्भ में कुछ नया खोजने की। जब तक हम नई खोज यात्रा के निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाएंगे, अहिंसा का कार्यान्वयन कोरी कल्पना बन कर रह जाएगा।

जन-जीवन को स्वस्थ बनाने के लिए अहिंसा ही एकमात्र विकल्प है, साधन है। इसलिए यह नितांत अपेक्षित है कि अहिंसा का अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार हो। उसके प्रति जन-निष्ठा जागृत हो। इस प्रयत्न से सभी लोग अहिंसक बन जाएंगे, हिंसा जड़-मूल से समाप्त हो जाएगी, सारी बुराइयों का अंत हो जाएगा, ऐसा सोचना अतिरेक है। हजार सार्थक और प्रबल प्रयत्नों के बावजूद कुछ प्रतिशत लोग ही पूर्ण अहिंसा के व्रत को स्वीकार कर सकेंगे और यह ठीक भी है। काम-क्रोध आदि शत्रुओं पर पूर्ण विजय प्राप्त करना कोई सहज बात नहीं है। यह एक आदर्श स्थिति है। आदर्श तक हर व्यक्ति नहीं पहुंच सकता, पर उस दिशा में एक-एक चरण आगे तो बढ़ ही सकता है।