अंहिंसा को जीवन में सर्वोपरी बनाये -आचार्य प्रभाकर सूरीजी म.सा

अंहिंसा को जीवन में सर्वोपरी बनाये -आचार्य प्रभाकर सूरीजी म.सा

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आकाश के आंगन से आषाढ की प्रथम बदली बह के और मयूर मुक्त मन से नृत्य करे… उसके अंग अंग में आंनद छलके इसी तरह महान पर्वाधिराज पर्युषण का आगमन होता है तब जैनों के हृदय में हर्ष की हेली चढती है… अंग अंग में आनंद का निरवधि सागर छलकता है। जैन शास्त्रों में धर्म करने वाले जीवों के तीन भेद बतायें है… सदैया, भदैया और कदैया।

सदैया – जो सदा धर्म की आराधना करते है। जिनकित धर्म क्रियाओं प्रतिक्रमण, सामायिक, जिनपूजा, उपवास, आदितप वगैरह की सदा आराधना करे उनको सदैया कहते है। हमेशा तप और त्याग करनेवालों तथा धर्म करने वालों और जप करने वाली ऐसी आत्माओं को उत्तम कहा गया है।

भदैया – जो हमेशा धर्मक्रिया नहीं करते है, परंतु भाद्रपद मास आये और प्रयुषण पधारे तब जिनको धर्म की याद आये जिन्हें धर्म की जीनोकत आराधनाओं का आराधन प्रिय लगे, भाई जिंदगी भर ऐसे ही पाप करते रहेंगे? पर्युषण जैसे पवित्र अवसर पर कुछ धर्म करें। इस तरह सोचकर जो लोग भाद्रपद मास के पर्युषणादि प्रसंगों में धर्म की आराधना करे, उन्हें भदैया कहतें है। ऐसी आत्माओं को दूसरे नंबर की उत्तम आत्माएं कहते है।

कदैया – जो कभी-कभी धर्म करते है। मन में आये तो करे और मन में ना आये तो धर्म के अवसर पर भी धर्म ना करे जभी मन हो जाये तभी धर्म की आराधना करने वाली ऐसी आत्माओं को कदैया कहते है। प्रत्येक धर्मीआत्मा को अपने अंतर को पूछकर निश्चित कर लेना चाहिये कि अपना नंबर इन तीनों वर्ग में से किस वर्ग में है। अगर सदैया न बन सके तो कुछ नहीं, आखिर भदैया तो सभी को बनना चाहियें। (प्रयुषण आराधना करने वाले) संसार की उपाधियों को दूर करके समाधि में लीन होने के लिये ही पर्युषण पर्व आता है। अशुभ अध्यवसायों को छोडक़र शुभ अध्यवसायों में रममाण बनने के लिये ही पर्युषण आता है। मोह की मायाजाल को तोडक़र और ममताओं को मारकर मन को महावीरमय बना देने के लिये पर्युषण आता है। इस महामुले अवसर पर नहीं जागोगे तो कब जागोगे? ऐसे पुण्य प्रसंग पर नहीं चेतोगे तो कब चेतोगे? पर्वाधिराज पर्युषण के प्रथम तीन दिनों में पांच कर्तव्यों का पालन करना जो आ जाये तो संसार भर की समस्याएं सुलझ जाये। विश्व के विकराल प्रश्नों के सचोट और सतर्क समाधान इन पांचों कर्तव्यों के पालन म समहित है। इसलिये इस लेख श्रेणी में हम पांच कर्तव्यों पर ही विस्तृत विचारणा करना चाहते है। सर्वप्रथम हम पांच कर्तव्यों के नाम जान ले

१. अमारिप्रवर्तन, २. साधर्मिक वात्सल्य, ३. क्षमापना, ४. अ_मका तप और, ५. चैत्यपरिपार्टी

प्रथम कर्तव्य है अमारिका आराधना। अ-मारि, शब्द दो शब्दों से बना हुआ है। मारि का अर्थ है हिंसा और अ-मारि अर्थात आहिंसा। धर्म का मूल है आहिंसा। धर्म -इमारत की मूल है आहिंसा । धर्म-कल्पवृक्ष बीज है आहिंसा। जैन शास्त्रों ने हिंसा की व्याख्या इस तरह की है: प्रमतयोगात् प्राणव्यपरोगणं हिंसा प्रमाद के कारण अन्य जीव के प्राण का नाश करना उसका नाम: हिंसा ऐसी हिंसा का त्याग करना उसका नाम: अहिंसा। जगत के अन्य जीवों के प्रति जब प्रेम उत्त्पन्न हो तब ही हिंसा का त्याग संभावित है। छोटे से छोटे क्षुद्र जंतुओं में भी अपने जैसा ही जीव द्रव्य है… एकेन्द्रिय (वृक्ष-पान वगैरह) से लेकर दो इंद्रिय (अलसिये…करमिये वगैरह) तेइंद्रिय (चीटी, खटमल वगैरह)चउरिन्द्रिय (मक्खी, मच्छर, भंवरा वगैरह) इन सब जीवों में मेरे जैसी ही एक आत्मा बसती है… इससे उनकी हत्या करना उनका नाश करना पाप है, ऐसी विचारणा सतत करते रहने से ही हिंसा से बच सकते है।

जिस हृदय में कोमलता नहीं है, दया नहीं है, करूणा नहीं है। उसे मानव हृदय तो किस तरह कहा जाये। जो सुख मुझे प्रिय है तो मुझो जगत के जीवों को सुख देना चाहिये। जो दुख मुझे प्रिय नहीं है तो जगत के अन्य जीवों को मुझे दुख देना ही नहीं चाहिये- यह विचार ही वास्तविक धर्म है। जो दूसरे जीवों को दुख देते है, वे स्वर्य दुख पाते है। जो दूसरे जीवों को सुख देते है वे स्वयं सुख पाते है। जैसा बोना वैसा उगना। जैसी करनी वैसी भरनी। इसी बुनियादी बात को हृदय की धरती पर अंकित कर लेने की जरूरत है। आर्य देश में पूर्व काल में दूसरों के सुख के विचार को प्रधानता दी जाती थी। आर्य देश में पूर्वकाल में दूसरों के विचार को प्रधानता दी जाती थी। जो दूसरे जीवों के सुख का विचार नहीं कर सकता है जो दूसरे जीवों की अहिंसा को जीवन में अपना नहीं सकता, वह धर्म करने के योग्य नहीं है। मुझे याद आती है, मेरे जीवन के आदर्श स्वामी विवेकानंदजी एक प्रेरक जीवन घटना। स्वामी विवेकानंद एक बार भारतीय संस्कृति के प्रचार के लिये विदेश जाने वाले थे। विवेकानंदजी की माता यह जानना चाहती थी कि, उनमें धर्म प्रचार करने के लिये विदेश जाने की योग्यता है कि नहीं। इससे माता ने विवेकानंदजी को घर आने का खास आग्रह किया। जब विवेकानंदजी आये तब उनकी माता ने उनका सत्कार करते हुए विविध सुंदर फल और साथ में एक छूरी एक थाल में रखकर दिये। स्वामीजी ने स्वर्य ही फलों को काटकर खाया। बाद में माता ने विवेकानंदजी से कहा बेटे मुझे वह छुरी दे, मुझे उसकी जरूरत है। तुरंत ही विवेकानंदजी ने माता को छूरी दी। माता बोल उठी, बेटे मेरी कसौटी में तु उत्तीर्ण हुआ है। अब धर्म संस्कृति के प्रचार को मेरे हृदय की अनगिनत आशिषे अर्पित करती हूं। विवेकानंदजी को आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा-माताजी, आपने मेरी कसौटी किस तरह से की वह मै समझ नहीं सका। मुझे आप बताएंगी? तब माताजी ने कहा, बेटे जब तुने मुझे छूरा वापस दिया तब मैने यह ध्यान रखा था कि किस तरह छूरी देता है। तुने छूरी की धारदार बाजू अपने तरफ रखी और लकड़े वाले बाजू मेरे तरफ रखी। क्योंकि तेरे मन में यह विचार पड़ा हुआ था कि लकड़ेवाली बाजू पकडऩे से माता को हानि नहीं होगी। इस तरह तूने मेरी दरकार की, मेरे सुख का विचार किया। यहीं तेरी कसौटी थी और तू पास हो गया। बेटे! मेरी दृष्टि से वहीं व्यक्ति धर्म करने का और धर्म का उपदेश देने का अधिकारी है जो सतत दूसरे के सुख का विचार करता है। ऐसा अधिकार तुझे प्राप्त हुआ इस बात का मुझे अपूर्व आनंद है।

सूक्ष्मातिसूक्ष्म बातों में भी जो दूसरे के सुख और हित की विचारणा करता है वह ही सच्चा धर्मी है। वह ही सच्चा अहिंसक है। अफसोस की बात यह है कि जिस देश को छूरी देते समय भी उसे हानि ना पहुंचे इसकी चिंता करते थे, उसी ही देश में आज चकचकित तीक्ष्ण छूरियां और तलवारें मूक और अबोल पशुओं के देह पर सरर्र से चल रहीं है। अहिंसा की विभूतियों की इस देश में हिंसा की धूम मची है। पशुओं की कुर कत्लेआम चली है। कुत्तों को पकडऩें के लिये कु्ररता का आचरण होता है। बंदरों की हिंसा करके उनके मांस की निर्यात होती है। जिव्हा की मांस लालसा के लिये गोधन और पशुधन का सर्वनाश हो रहा है। आज नानवी के खून का प्यासा बन गया है। हिंसा और कत्लेआम मानों दैनिक जीवन का एक हिस्सा बन गयी है। ऐसे संहारक संस्कृति द्रोही, ऐसे अत्याचारी और आतंकवादी इस देश की धरती पर फैलते जायेंगे तो अब देश को कोई भी नहीं बचा सकेगा। इस देश का, राष्ट्र का उसकी संस्क्रति का और उसकी समृद्धि का जतन करना हो, तो अहिंसा को जीवन में सर्वोपरी स्थान देना ही पड़ेगा। पशुधन का विनाश रोकना ही पड़ेगा। पशुधन का विनाश प्रजा का विनाश है इसी विचार को गंगा के प्रवाह की तरह सतत बहता करना पड़ेगा। जियों और जिने दो के श्री महावीरदेव के सिद्धांत को मात्र जैनो को ही नहीं, सुख की कामनावाले सभी जीवों को आत्मसात करना पड़ेगा। अमेरिकी अहिंसा की आराधना को मात्र प्रासंगिक कर्तव्य मानने के बदले जीवन के सर्व क्षेत्रों में और सर्व समय में प्राधान्य देना ही पड़ेगा।