निराला पर्व पर्युषण -आचार्य श्री महाप्रज्ञ

निराला पर्व पर्युषण -आचार्य श्री महाप्रज्ञ

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यह पर्व आध्यात्मिक विकास का पर्व है। भौतिक विकास, आर्थिक विकास, बौद्धिक विकास- विकास की बहुत सारी शाखाएं हैं। आज का युग विकास का युग है। किन्तु चेतना का विकास नहीं हो रहा है। अध्यात्म का विकास नहीं हो रहा है। जब अध्यात्म का विकास नहीं होता, चेतना का विकास नहीं होता तब स्थितियां जटिल बन जाती हैं और जब चेतना का अध: पतन होता है तब मानसिकता दूसरे प्रकार की बन जाती है। जब समाज की चेतना नाभि के आस-पास परिक्रमा करती है, तब लड़ाई-झगड़ा, कलह, स्पर्धा छीना-झपटी, चोरी, घोटाला और गबन होते हैं। ऐसी स्थिति में मनुष्य का स्वयं पर नियंत्रण नहीं रह जाता। जो मन में आता है, कर लेता है।

आज की एक प्रमुख समस्या है भ्रष्टïाचार। लोग कह रहे हैं बात सौ प्रतिशत सही है कि आज भ्रष्टïाचार बहुत ज्यादा है, दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। लेकिन क्यों बढ़ रहा है? भ्रष्टïाचार इसलिए बढ़ा है कि व्यक्ति की चेतना नीचे की ओर जा रही है। भ्रष्टïाचार को मिटाना है तो चेतना के पतन को रोककर उसका ऊध्र्वारोहण करना होगा। इसका ठीक से प्रस्तुतिकरण किया जाएं तो करना होगा।

पर्युषण पर्व अपने ढंग का एक निराला पर्व है। भारतीय संस्कृति में इसके समान कोई दूसरा पर्व नहीं ऐसा पर्व जिसमें उपशम की बात सिखायी जाती है। आमोद-प्रमोद के तो बहुत से पर्व हैं, किन्तु चेतना के रुपांतरण की प्रक्रिया वाले कितने पर्व हैं? इस पर्व में मैत्री का पाठ पढ़ाया जाता है क्षमा, अभय का पाठ पढ़ाया जाता है।

महावीर का जीवन चरित्र पढं़े। वे कभी किसी से डरे नहीं, साक्षातï् अभय और निर्भयता की मूर्ति थे। जो भी व्यक्ति आध्यात्मिक विकास करेगा, अपनी चेतना का ऊध्र्वारोहण करेगा, उसका भय समाप्त हो जाएगा। भय कब पैदा होता है? भय का उत्स कहां है? जब चेतना नाभि के आसपास होती है तो आदमी को डर लगता है। पदार्थ की परिक्रम करने वाली चेतना हर समय डरती रहती है कि कहीं ऐसा न हो जाएं, वैसा न हो जाएं। किन्तु महावीर को कभी डर नहीं लगा। इसलिए नहीं लगा कि उसकी चेतना का ऊध्र्वारोहण हो गया था। न वे चंडकौशिक से डरे, न अर्जुन माली से, न संगम देव से डरे जिसने मारणन्तिक कष्टï दिये।

जब चेतना शरीर के साथ रहती है तो आदमी डरता है। जब चेतना धन के साथ, पदार्थ के साथ रहती है, तो आदमी डरता है। किन्तु जब शरीर, धन, परिवार के बंधन टूट जाते हैं, चेतना इन सबके ऊपर चली जाती है तो डर-भय सब समाप्त हो जाते हैं। जितना-जितना पदार्थ और शरीर शक्ति उतना ही ज्यादा डर। एक बात जान लें कि बड़े लोग जितना डरते हैं, उतना छोटे लोग नहीं डरते। बड़े लोगों के भयभीत होने के कई कारण होते हैं। दिल्ली में अधिसंख्य आबादी निर्भय होकर कहीं भी आ-जा सकती है, उन्हें उतना भय नहीं है। किन्तु सत्ता और सरकार से जुड़े लोगों के साथ यह बात नहीं हैं। उनका स्वेच्छा से कहीं आना-जाना संभव नहीं है। कहीं जाना है तो कड़ी सुरक्षा और तामझाम है उनके साथ। डर बड़े लोगों को ज्यादा है। जहां बड़प्पन की छाप लग गई। धन, पदार्थ और ऐश्वर्य उन पर हावी हो गया, डर भी समझ लें उसी के साथ शुरू हो जाता है। जिसके पास कुछ भी नहीं -जो अकिंचन है, रुपया-पैसा, घर-मकान कुछ भी नहीं, मात्र भिक्षा पर जीवन निर्वाह करता है-जिसने शरीर को भी अपना नहीं माना, उसके लिए डर कैसा?

आचार्य भिक्षु भी शरीर की चिंता से मुक्त थे। वे बहुत हद तक महावीर की परंपरा के साधक थे। महावीर वाणी के भक्त और आराधक थे। उन्होंने महावीर-वाणी को अपने जीवन में अक्षरश: सत्यापित करने का प्रयत्न किया। वे कभी किसी से डरे नहीं, किसी को डराया नहीं। जहां उन्हें लगा कि यह मौत का घर है, वहां भी उन्होंने प्रयास किया। कारण यही कि शरीर का भय या शरीर की चिंता उन्हें नहीं थी। जब पक्का फैसला कर लिया कि हमें अभीष्टï की प्राप्ति करनी है, शरीर मेरे लिए साध्य नहीं है, साधन है तो फिर उन्हें किसी तरह का कोई भय नहीं रह गया।

जो सवंत्सरी पर्व के संदेश को समझने का प्रयत्न करता है, जो महावीर के जीवन को समझने का प्रयत्न करता है, जो आचार्य भिक्षु के संदेश को समझने का प्रयत्न करता है, उसका सारतत्व यही है कि चेतना का ऊध्र्वारोहण करो, शरीर के बंधन से मत बंधे रहो। चेतना शरीर से बंधकर रहेगी तो वह नाभि के नीचे रहेगी। वहां फिर यही स्थिति बनेगी कि बात-बात पर कलह और संघर्ष होगा।

मुंबई यात्रा के दौरान लोकसभा के अध्यक्ष मनोहर जोशी मिलने आए। मैंने उनसे बातचीत के दौरान कहा कि पालिर्ययामेंट हाउस में जो होता है, उसे टी.वी पर आप न दिखाएं तो अच्छा होगा। उसका देश की युवा और बालपीढ़ी पर बहुत बुरा असर पड़ता है। जिनके ऊपर देश को चलाने की जिम्मेदारी है, वे अपने देश की जनता को लड़ाई-झगड़ा और मारपीट सिखाएं, यह अच्छी बात नहीं।

सवंत्सरी सर्वोत्तम पर्व इसलिए है कि क्रोध, मान, माया, लोभ -ये चारों भीतर के दोष हैं। क्षमा, विनम्रता या मृदुता, सरलता और संतोष- ये चार अध्यात्म के गुण हैं। जब क्रोध, अहंकार, मान, माया, लोभ आदि होते हैं, वहां चेतना अध्यात्म के प्रïतिकुल हो जाती है, वह पदार्थ के जगत में चली जाती है। जब क्षमा, मृदुता, विनम्रता का विकास होता है तो चेतना आध्यात्मिक बन जाती है। सवंत्सरी का संदेश भय और शत्रुता के भाव को निर्मूल करने का संदेश है। भय का मतलब ही है शत्रुता का एक बीज अपने भीतर बो लिया, वह हर समय आपको डराता रहेगा।

आठ दिन का यह समय अध्यात्म चिंतन का समय है। समस्या के समाधान को इससे उपयुक्त समय और कोई नहीं हो सकता। हर समस्या का आध्यात्मिक समाधान भी होता है। मैंने इस संदर्भ में एक पुस्तक भी पढ़ी-सोल्युशन ऑफ एव्री प्रॉब्लम। यह आठ दिन का समय प्रयोग का समय है, जिसमें हम समस्याओं का हल खोजें। समस्या चाहे शरीर की हो, मन की हो, भावों की हो, कोई भी समस्या हो, उस पर इन आठ दिनों में विचार होना चाहिए। अगर ऐसा होगा तो पर्यूषण पर्व एक प्रायोगिक पर्व बन जाएगा। हमारे जीवन को समस्यायुक्त बनाने वाला पर्व बन जाएगा।

– प्रस्तुती मुनि जयंत कुमार