श्री वरकाणा तीर्थ/ Shri Varkana Tirth: The idol of Varchana Parshvanath is...

    श्री वरकाणा तीर्थ/ Shri Varkana Tirth: The idol of Varchana Parshvanath is very ancient. From the ground, it was found by a Shephered. In the year 1211 of the Vikram era, this splendid temple was build and the idol of the Mulnayak was installed in it.

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    पाली जिले में अनेक जैन तीर्थ है जिसका अपना अलग अलग महत्व और इतिहास है लेकिन इस जिले का वरकाणा तीर्थ जहां एक ओर अपने समृद्ध अतीत और स्थापत्यकला के लिए प्रसिद्ध है, वहीं साथ ही धार्मिक द्रष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। वरकाणा गांव कोई दो सौ घरों की बस्ती है लेकिन आज एक भी जैन परिवार का स्थाई निवास यहां नहीं है फिरभी वरकाणा, जैन समाज का एक बड़ा तीर्थ है क्योंकि यहाँ पार्श्वनाथ भगवान का प्राचीन मंदिर होने के साथ ही गोडवाड़ जैन महासभा का मुख्यालय भी है और यहॉ एक शिक्षण संस्था है जहां प्रतिवर्ष सैकड़ो आदर्श जैन व्यक्तित्व का निर्माण किया जा रहा है। कहते हैं कि प्रचीनकाल में यहां एक विशाल नगर था जिसमें हजारों जैन परिवार निवास करते थे लेकिन प्रकृति की क्रान्ति के कारण यह नगर भूगर्भ में समा गया। पुरातत्व विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस क्षैत्र में हुई राजनैतिक क्रान्ति के कारण यहां के समस्त जैन परिवार यह नगर छोड़ कर चले गये जिससे नगर उजड़ गया। वरकाणा को प्रचीनकाल में वरकनपुर या वरकनकनगर के नाम से पुकारा जाता था। कहते हैं उस समय यहां अनेक जैन मंदिर होने का उल्लेख तीर्थवंदना स्त्रोत में मिलता है जिससे भी वरकाणा की प्राचीनता पुष्ट होती है। ऐसा अनुमान है की आज का दादाई गांव और बिजोवा गांव उसी प्राचीन वरकाणा की पवित्र भूमि पर बसे हुए हैं। वरकाणा में पार्श्वनाथ भगवान का मंदिर किसने बनवाया इसके कोई ठोस प्रमाण नहीं मिल रहे हैं लेकिन कहा जाता है कि लगभग चारसों या पांचसौ वर्ष पूर्व एक किसान को खेत की जुताई के समय पार्श्वनाथ की यह प्रतिमा मिली थी जो राजा सम्प्रति के काल की बताई जाती है। इस प्रतिमा को बिजोवा एवं दादाई गांव के जैन संघों ने मिल कर यहां एक मंदिर बनवाया था और उसी छोटे से मंदिर में उसे प्रतिष्ठित कर दी। इस प्रतिमा के साथ ही मंदिर के खंभे, तोरण और अन्य कलापूर्ण पत्थर भी मिले जिन्हे श्रीमालपुर के ेक सेठने मंदिर को विशाल रूप देते समय उसमें लगा दिये। इस मंदिर के निर्माणकाल के बारे में कोई शिलालेख नहीं है किन्तु मंदिर की नवचोकी के एक स्तंभ पर एक शिलालेख है जिसपर १६वीं शताब्दी का अस्पष्ठ सा उल्लेख है जिससे और इसकी बनावट के काल से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि यह मंदिर चारसौ साल से अधिक पुराना है। इस मंदिर के लिए मेवाड़ के राजाओं द्वारा दी गयी भेंट के संबध में ताम्रपत्र आज भी उपलब्ध है जो इस मंदिर के प्रति तत्कालीन राजाओं की भक्ति को प्रमाणित करता है।

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    वरकाणा तीर्थ में श्री पार्श्वनाथ भगवान के बावन जिनालय वाले भव्य एवं रमणीय मंदिर होने के कारण यह प्रसिद्ध रहा है। यह मंदिर पूर्वाभिमुख है लेकिन इसका एक द्वार उत्तर दिशा में भी है दोनों दरवाजों के उपर विशाल कलापूर्ण बारादरियां व झरोखे होने से प्रवेश द्वार बड़े आकर्षक लगते हैं। इनमें पूर्व दिशा वाला दरवाजा बन्द रखा जाता है और उत्तर की ओर वाले प्रवेश द्वार को ही मुख्य द्वारा माना गया है क्योंकि इसके आगे दो विशाल हाथी खड़े किये गये हैं। यहीं पर एक शिलालेख लगा हुआ है जिससे पता चलता है कि मेवाड़ के राणाओं पर जैन आचार्योंकि सात्विक सिद्धी का प्रभाव था वरकाणा में सैकडों वर्षो से पोष दशमी को मेला भरता है उसमें हजारों जैन यात्री भाग लेने के लिए यहां आते थे लेकिन उनसे यात्री कर की वसूली करने के आदेश थे परन्तु तपागच्छीय श्री विजयदेवसूरि जी के उपदेश से राणा जगतसिंह ने सं. १६८६ में मेले के अवसर पर चार दिन तक यात्री कर वसूल करने पर रोक लगा दी थी। मंदिर में प्रवेश करते ही नवचोकी आती है जहां मुख्य मंदिर के ठिक सामने एक हाथी और उसपर बैठे सेठ सेठानी की प्रतिमा है जिसपर कोई लेख नहीं होने के कारण ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि इस मंदिर के निर्माण में इनका विशेष सहयोग रहा होगा।

    मूलमंदिर में प्रवेश करने से पूर्व बाहर की ओर बना कलापूर्ण झरोखा और बारीक नक्काशी वाले खंभे, मंदिर के अन्दर की स्थापत्यकला का आभास दिला देते हैं। आध्यात्म एवं कला का अद्भुत संगम वरकाणा तीर्थ में आते ही प्रत्येक व्यक्ति आश्चर्यचकित हुये बिना नहीं रहता। अनेक बार तो यह आभास होने लगता है कि यह मंदिर राणकपुर की लघुकृति है। मंदिर की शिल्पकला बेजोड़ है, रंगमंण्डपकी कोरणी और तोरण द्वार की बनावट भी सुन्दर है। लगता है शिल्पियों ने अपनी सम्पूर्ण कला से इस मंदिर को सजाया है संवारा है। मंदिर के चारों ओर खंभो की कतार और उनकी एकरूपता भी यहां के शिल्पकौशल का चमत्कार है। रंगमण्डपकलपूर्ण स्तंभो व गुम्बज बना कर निर्मित किया गया है परन्तु दीवारों पर अनेक प्रकार की भावभंगिमाओ के साथ जिन प्रतिमाओ का निर्माण किया गया है उसे देख कर दर्शक दंग रहे बिना नहीं रह सकता। मण्डप से जुड़ी प्रदिक्षणा में छोटी छोटी देवकुलिकाओं की लम्बी कतार है जिसमे चलने के लिये छोटासा मार्ग है। वरकाणा तीर्थ के मूलनायक भगवान श्री पार्श्वनाथजी की नागफणी वाली प्रतिमा चित्त तो आनन्दित करने वाली है। इस प्रतिमा के दर्शन करने से लगता है जैसे मैने आज सब कुछ पा लिया हो, यही अनुभूति हजारों यात्रियों को बार बार यहां आने को विवश करती है। इस मूल प्रतिमा के अतिरिक्त अन्य कई छोटी बड़ी प्रतिमाएं इस मंदिर मे प्रतिष्ठित है, यहां अन्य २३ जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाओं के दर्शन भी होते हैं। प्राकृतिक प्रकाश वाले रंगमण्डपकी छत पर नृत्य मुद्राओं में अनेक मोहक मूर्तियां है, कहीं श्रृंगार में लीन तो कहीं दर्पण देखती हुई। इन कलापूर्ण मूर्तियां है, कहीं श्रृंगार में लीन तो कहीं दर्पण देखती हुई। इन कलापूर्ण मूर्तियों को देख कर दर्शक मौन हो जाता है और यह मूर्तियां जैसे बोलने लगती है। वरकाणा तीर्थ के जिनालय का मुख्य शिखर और उसके चारों ओर छोटे छोटे शिखर एैसे लगते हैं जैसे खिला हुआ कमल। उंचे और तीखे शिखरों के साथ गोलाकार घुमट भी बहुत सुन्दर लगते हैं। मंदिर के बाहर अधिष्ठायक देव की प्रतिमा आते हैं तथा भगवान श्री पार्श्वनाथ के दर्शन कर अपना जीवन सफल बनाते हैं। मंदिर के पास ही यात्रियों के लिए भोजनशाला तथा आवासीय आधुनिक सुविधाओं से युक्त धर्मशाला भी है। यहां भगवान पार्श्वनाथ के नाम पर ही चल रहे जैन विद्यालय के छात्रों को सुसंस्कृत तथा धर्मप्रेमी बनाने में इस तीर्थ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। विद्यालय के बालक नियमित रूपसे भगवान के दर्शन करने मंदिर जाते हैं, वहां पूजा अर्चना करते हैं। आधुनिक भौतिकवाद की चकाचौंध से बैचेन तथा अशान्त व्यक्ती इस तीर्थ पर आकर परमशान्ति अनुभव करता है तथा भगवान पार्श्वनाथ के दर्शन करने से उसकी आत्मा जागृत होती है। वरकाणा तीर्थ रानी रेल्वे स्टेशन से ७ किलोमीटर दूर है तथा रानी से देसूरी सड़क मार्ग पर स्थित है। वरकाणा आने के लिए रानी पर बसो व टेक्सियों की सुविधा है। वरकाणा के बिल्कुल पास ही बीजोवा गांव में भी आकर्षक जैन मंदिर है जिसमें गांव के बीच चिंतामणी पार्श्वनाथ का प्राचीन मंदिर कलापूर्ण है तथा दूसरा नवनिर्मित मंदिर बस स्टॅड पर है जिसमें घंटाकर्ण महावीर भगवान की प्रतिमा स्थापित है।