श्री नारलाई तीर्थ / Shree Narlai Tirth: Founded by Shri Naradji, this...

    श्री नारलाई तीर्थ / Shree Narlai Tirth: Founded by Shri Naradji, this city has much importance, as the tirth is said to be established by Pradyumna Kumar, the son of Shri Krishna.

    SHARE

    श्री नारलाई तीर्थ / Shree Narlai Tirth

    गोडवाड़ की जैन पंचतीर्थी का एक तीर्थ नारलाई, मंदिरों की नगरी के नाम से प्रसिद्ध है। छोटी बड़ी पहाड़यों की गोद में बसे, इस प्राचीन गांव में आज भी २१ मंदिर है जिनमें ११ जैन मंदिर हैं। कहते हैं कि किसी जमाने में यहां १०८ मंदिर थे जिनकी झालरें और नगाडों की ध्वनि से अरावली पर्वत गूंज उठता था। नारलाई के प्राचीन शिलालेखों और ग्रंथों के अनुसार इसका प्राचीन नाम नन्दकुलवन्ति, नारदपुरी और नाडुलाई था। नारद मुनि ने अनुपम प्राकृतिक सौन्दर्य वाली इस भूमि पर तपस्या की थी और यहीं एक नगरी बसाई थी जो आज नारलाई के नाम से प्राचीन नगरी के अवशेष के रूप मे स्थित है। कहते है प्राचीनकाल में इस नगरी का विस्तार वर्तमान नाडोल तक होने का उल्लेख मिलता है लेकिन समय के फेर से साथ इनके बीच ६ किलोमीटर की दूरी हो गई जिससे नारलाई और नाडोल ने अपना अलग अलग अस्तित्व बना लिया। नारलाई के समस्त जैन मंदिरों में श्री आदिनाथ भगवान का मंदिर सबसे प्राचीन लगता है। इसकी बनावट और शिल्पकला से अनुमान लगाया जाता है कि यह मंदिर दसवीं शताब्दी से भी प्राचीन होना चाहिये। परन्तु मंदिर में उत्कीर्ण अलग अलग शिलालेखों में सबसे प्राचीन लेख संवत ११८७ का है जिसमें मंदिर की पूजा निमित्त दान देने का उल्लेख चौहान राजा रायपाल द्वारा किया गया है। इन शिलालेखों से ही यह तथ्य उजागर होते हैं कि इस मंदिर में पहले मूलनायक महावीर स्वामी थे और संवत १६८६ में आदिनाथ भगवान की प्रतिमा प्रतिष्ठित की गई है। मंदिर में परिकर पर अंकित लेख से यह भी प्रकट होता है कि यह मंदिर राजा सम्प्रति द्वारा निर्मित है। इसी लेख के अनुसार मंदिर का प्रथम जीर्णोद्धार मंत्री सायर द्वारा हुआ तथा दूसरा उद्धार गांव के जैन संघ ने करवाया तथा तीसरा उद्धार मंत्री सायरके वंशजों द्वारा करवाने का उल्लेख है। संवत १५९७ के एक लेख में यह मंदिर संडेरकगच्छीय यशोभद्रसूरी अपनी मंत्र शक्ति से खेड़ नगर से उड़ा कर लाये थे इस संबध में कई जैन ग्रंथो में इसका विवरण मिलता है। कहते हैं कि यशोभद्रसूरी जी एवं योगी तपेश्वरजी दोनो ही योगसाधना में प्रवीण होने के साथ तंत्र-मंत्र के जबरदस्त ज्ञाता थे। इन दोनों के बीच राजसभा में कईबार शास्त्रार्थ हुआ अन्त में एक दिन दोनों ने शक्ति परिक्षण करने के लिए अपने अपने धर्म के मंदिरों को खेड़ नगर से मंत्रशक्ति द्वारा उड़ा कर नारलाई लाना बताया जाता है। इस के संबध में एक दोहा प्रचलित हैः- संवत दश दहो तर, ददिया चोरासी वाद। खेड़ नगर थी लाविया, नारलाई प्रासाद।।

    श्री यशोभद्रसूरिजी द्वारा आकाश मार्ग से अपनी साधना शक्ति से लाया हुआ मंदिर एक तीर्थ के रूप में आज भी विद्यमान है तथा यहां इन दोनो महान आत्माओ को जसिया व केशिया के नाम से याद किया जाता है। श्री यशोभद्रसूरिजी व श्री केशवसूरिजी (तपेश्वर) अपने अन्तिम दिनो में नारलाई में ही रहे तथा यहीं पर स्वर्ग सिधारे जिनके स्तूप यहाँ अभी भी विद्यमान है, कहते हैं कि यह स्तूप पासपास ही है और यह दोने स्तूप घटते बढ़ते हैं। इस प्राचीन मंदिर की बनावट और स्थापत्यकला सुन्दर है, मंदिर के प्रवेश द्वार पर दोनो ओर बड़े हाथी बने हुए हैं, प्रवेश द्वारा पर एक शिलाखण्ड रखा हुआ है जिसके नीचे झुककर मंदिर में प्रवेश लेना पड़ता है। जिनालय के रंगमण्डप के भित्तिचित्र की कला अद्भुत है। सामने ही मूलनायक आदिनाथ भगवान की सुन्दर तथा चमत्कारी प्रतिमा बिराजमान है। मंदिर के विशाल शिखल और उसपर स्वर्णकलश तथा फहराती ध्वजा कोसों दूर से अपने भक्तों को आकर्षित करती है। इस मंदिर में पहले महावीर स्वामी की प्रतिमा ही थी इसकी पुष्टी इस बात से भी होती है कि इस मंदिर को वीरा देवल भी कहते हैं। मंदिर के मूल गंभारे के उपर विशाल शिखरके आसपास देवकुलिकाओं के छोटे छोटे शिखर इसकी भव्यता का विस्तृत स्वरूप प्रदान कर रहे हैं। मंदिर के बाहर प्रांगण में अधिष्ठायक देव स्थापित है जिसे गांव के सभी जाति सम्प्रदाय के लोग पूजते हैं। नारलाई के अन्य जैन मंदिरों में प्रसिद्ध गिरनार तीर्थ है इसमें नेमीनाथ भगवान की श्यामवर्णी प्राचीन प्रतिमा प्रतिष्ठित है। गिरनार पहाड़ी के दाहिनी ओर सहसावन तीर्थ है, यहां पर नेम-राजुल के पदचिन्ह है। गिरनार पर्वत पर नेमीनाथ भगवान की स्थापना श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युमन कुमार द्वारा करने का उल्लेख मिलता है, यही कारण है कि इस पर्वत को यादव टेकरी भी कहते हैं। इस टेकरी के सामने दूसरी टेकरी है जिसे शत्रुन्जय तीर्थ कहा जाता है जहाँ मंदिर में आदिनाथ की प्रतिमा है। गिरनार एवं शत्रुन्जय तीर्थ के प्रतीक माने जाने वाले नारलाई के इन दोनों मंदिरों के बारे में कहा जाता है कि आबू स्थित देलवाड़ा के जैन मंदिर के निर्माता वास्तुपाल व तेजपाल का ऐसा संकल्प था कि वे शत्रुन्जय व गिरनार तीर्थ के दर्शन करके ही पच्चमक्खान करते थे, जब वे नारलाई आये तो अपने संकल्प के अनुसार यहां दोनों मंदिरों की स्थापना की। यहां एक सुपार्श्वनाथजी का मंदिर है, इसके निर्माण के पीछे भी एक रोचक घटना जुड़ी है। एक बार इस क्षैत्र में भारी अकाल पड़ गया, यहाँ के गरीब किसार राजा को लगान देने में असमर्थ थे, ऐसी स्थिति में नगरसेठ ने सभी किसानों का लगान राजा के पास जमा करवा दिया, जब राजा को इस बात की जानकारी हुई तो राजा ने लगान की राशि सेठ को लौटा दी। सेठ ने वह राशि घर में न रख कर इससे भव्य जैन मंदिर का निर्माण करवा दिया। इस मंदिर की कलापूर्ण बनावट दर्शनीय है। मंदिर निर्माण की विशेषता का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि इस मंदिर के बाहर भूमि पर खड़े रहकर अथवा घोड़े पर सवार होकर या फिर हाथी पर भी सवार होकर कैसे भी मूल देवता के दर्शन किये जा सकते हैं। इन सभी जैन मंदिरो के साथ श्री शान्तिनाथ भगवान का मंदिर, श्री सोगटिया पार्श्वनाथ, श्री गौड़ी पार्श्वनाथ और श्री वासूपूज्य स्वामी का मंदिर है। नारलाई के ये जैन मंदिर कला व शिल्प के अनुपम भण्डार है। इन मंदिरों के नक्काशीदार स्तम्भों पर उत्कीर्ण प्रतिमाएं, तोरण द्वार, भव्य गुम्बद तथा उतुंग शिखर तक कलात्मक शिल्पकोरणी, नारलाई को कला एवं संस्कृती का संगम बना दिया है। नारलाई को जैन धर्म के महान कवि ऋषभदास तथा आचार्य विजयसेनसरीश्वरजी का जन्मस्थान होने का भी गौरव प्राप्त है। गोडवाड़ की यह मंदिरों की नगरी नारलाई का केवल धार्मिक महत्व नही है बल्कि राजनैतिक महत्व भी रहा है। इसे अनेक राजाओं ने

    नारलाई के जेकल पहाडी पर बने पत्थर के हाथी और उसपर बैठी एक मूर्ति के पीछे भी दन्त कथा प्रचलित है। कहते हैं कि नारलाई के जागीरदार अभयराज मेड़तिया ने कई हाथी खरीद किये लेकिन जैसे ही हाथी को नारलाई में लाते तो हाथी मर जाता। अभयराज ने भगवान शिव को प्रार्थना की कि अगर हाथी जीवित रह गया तो नारलाई के इस जेकल पहाड़ को हाथी का रूप दे दूंगा। हाथी खरीद कर लाया गया लेकिन वह जीवित रहा इस पर अभयराज ने पूरी टेकरी को हाथी का रूप दे दिया जिससे आजी भी यह टेकरी बैठे हुए हाथी की भांति है। अभयराज की स्मृति में उनके वंशजों ने टेकरी के उपर अभयराज की सवारी सहित एक हाथी बनवाया जो बहुत दूर से दिखाई देता है। नारलाई में जैनो के लगभग १३० घर हैं जिसमें ओसवाल व पोरवाल दोनो ही आपसी प्रेम व सौहार्दपूर्ण ढ़ंग से रहते हैं। यहां पौषधशालाएं और आयम्बिल खाता के साथ दो जैन धर्मशालाएं और एक भोजनशाला की भी व्यवस्था है। नारलाई गांव पश्चिमी रेल्वे के रानी स्टेशन से पूर्व की ओर सड़क मार्ग से २८ किलोमीटर दूर है। रानी से नारलाई आने के लिये बस सुविधा सुलभ है।