Mohan Kheda: Nearly 70 cms. high, white-colored idol of Bhagawan Adishvar in...

    Mohan Kheda: Nearly 70 cms. high, white-colored idol of Bhagawan Adishvar in the Padmansana posture.

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    श्री मोहनखेड़ा तीर्थ/Shree Mohan Kheda Tirth

    पूजनीय दादा गुरुदेव श्रीमद्‍ विजय राजेंद्र सूरीश्वरजी मसा की दिव्य दृष्टि का परिणाम मोहनखेड़ा महातीर्थ है। श्री राजेंद्र सूरीश्वरजी संवत 1928 व 1934 में राजगढ़ में चातुर्मास कर चुके थे। संवत 1938 में उन्होंने आलीराजपुर में चातुर्मास किया और उसके पश्चात उनका धार जिले के राजगढ़ में फिर पदार्पण हुआ। इस दौरान गुरुदेव ने श्रावक श्री लुणाजी पोरवाल से कहा कि आप सुबह उठकर खेड़ा जाएँ व घाटी पर जहाँ कुमकुम का स्वस्तिक दिखे वहाँ निशान बनाएँ तथा उस स्थान पर एक मंदिर का निर्माण करें। गुरुदेव के आदेशानुसार लुणाजी ने मंदिर निर्माण कार्य प्रारंभ करवाया। संवत 1939 में गुरुदेव का चातुर्मास निकट ही कुक्षी में हुआ और संवत 1940 में वे राजगढ़ नगर में रहे। श्री गुरुदेव ने इसी दौरान शुक्ल सप्तमी के शुभ दिन मूल नायक ऋषभदेव भगवान आदि 41 जिन बिंबियों की अंजनशलाका की। मंदिर में मूल नायकजी व अन्य बिंबियों की प्रतिष्ठा के साथ ही उन्होंने घोषणा की कि यह तीर्थ भविष्य में विशाल रूप धारण करेगा और इसे मोहनखेड़ा के नाम से पुकारा जाएगा। आज यह तीर्थ उनके ही आशीर्वाद की वजह से महातीर्थ बन चुका है।

    वर्तमान में तीर्थ परिसर में विशाल व त्रिशिखरीय मंदिर है। मंदिर में मूल नायक भगवान आदिनाथ की 31 इंच की सुदर्शना प्रतिमा विराजित है, जिसकी प्रतिष्ठा गुरुदेव द्वारा की गई थी। अन्य बिंबियों में श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ एवं श्री चिंतामणी पार्श्वनाथ हैं। गर्भगृह में प्रवेश हेतु संगमरमर के तीन कलात्मक द्वार हैं। गर्भगृह में श्री अनंतनाथजी, श्री सुमतिनाथजी व अष्टधातु की प्रतिमाएँ हैं। मंदिर के ऊपरी भाग में एक मंदिर है, जिसके मूल नायक तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ हैं। इसके अलावा परिसर में श्री आदिनाथ मंदिर का निर्माण भी करवाया गया है। भगवान आदिनाथ की 16 फुट 1 इंच ऊँचाई वाली विशाल श्यामवर्णी कायोत्सर्ग मुद्रावाली श्वेतांबर प्रतिमा विराजमान है। प्रतिमा अष्टमंगल आसन पर स्थित है। मोहनखेड़ा में मुख्य मंदिर के दाहिनी ओर तीन शिखरों से युक्त पार्श्वनाथ मंदिर की प्रतिष्ठा भी की गई है।

    इसमें भगवान पार्श्वनाथ की श्यामवर्ण की दो पद्मासन प्रतिमाएँ स्थापित हैं। जैन परंपराओं में तीर्थंकर भगवंतों, आचार्यों व मुनि भगवंतों की चरण पादुका की स्थापना की परंपरा है। श्रीमद्‍ विजय राजेंद्र सूरीश्वरजी मसा द्वारा स्थापित भगवान आदिनाथ के पगलियाजी स्थापित हैं, जहाँ एक मंदिर बना हुआ है। गुरुदेव की पावन प्रतिमा मोहनखेड़ा में स्थापित की गई। उनका अग्नि संस्कार मोहनखेड़ा में ही किया गया था। आज इस प्रतिमा के आसपास स्वर्ण जड़ा जा चुका है, साथ ही इस समाधि मंदिर की दीवारों पर अभी भी स्वर्ण जड़ने का कार्य जारी है। गुरुदेव के ही आशीर्वाद का परिणाम है कि यह तीर्थ अब मानवसेवा का भी महातीर्थ बन चुका है। यहाँ श्री आदिनाथ राजेंद्र जैन गुरुकुल का संचालन किया जा रहा है, जिसमें विद्यार्थियों के आवास, भोजन व शिक्षण हेतु व्यवस्था की जाती है। इसके अलावा श्री राजेंद्र विद्या हाईस्कूल का भी संचालन किया जा रहा है, जिसमें सैकड़ों विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। दुनिया का प्रत्येक धर्म यह शिक्षा देता है कि मानवसेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं है। इसी ध्येय वाक्य के साथ यहाँ पर श्री गुरु राजेंद्र मानवसेवा मंदिर चिकित्सालय संस्था भी संचालित है। इस चिकित्सालय में नाममात्र के शुल्क पर सुविधाएँ दी जाती हैं। नेत्रसेवा के लिए भी यह तीर्थ प्रसिद्घ है। 1999 में तीर्थ पर 5 हजार 427 लोगों के ऑपरेशन किए गए। इसके अलावा आदिवासी अंचल में शाकाहार के प्रचार व व्यसन मुक्ति हेतु शिविरों का आयोजन किया जाता है। इतना ही नहीं गोवंश के लिए यहाँ 9 हजार वर्गफुट आकार की श्री राजेंद्र सुरि कुंदन गोशाला है, जिसमें सर्वसुविधायुक्त 4 गोसदन बनाए गए हैं। पशुओं के उपयोग के लिए घास आदि के संग्रह हेतु 10 हजार वर्गफुट का विशाल घास मैदान भी है। इस तरह कई सामाजिक सरोकार से भी यह तीर्थ जुड़ा हुआ है। इस सामाजिक सरोकार में मुनिराज ज्योतिष सम्राट श्री ऋषभचंद्र विजयजी मसा की प्रेरणा और उनकी मेहनत काफी महत्वपूर्ण है।