श्री मांडोली तीर्थ / Shree Mandoli Tirth :Mandoli is a village in...

    श्री मांडोली तीर्थ / Shree Mandoli Tirth :Mandoli is a village in Jalore district of Rajasthan state in India. It is known mainly for the Jain temple dedicated to Guru Shantivijay Surishwarji.

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    भगवान महावीर प्रभु के अहिंसा परमो धर्म के संदेश को जन-जन की वाणी बनाने में मारवाड़ के ऋषि-मुनियों की कोई सानी नहीं है। ऐसे में कोलोजी से दादा गुरूश्री धर्म विजयजी बने इस रत्नराज मुनि देव ने अखंड भारत भूमि में त्याग, तपस्या, अहिंसा, ज्ञान, भक्ति एवं दया का दिव्य संदेश देकर कलयुगी मानव जाति का उद्धार किया। जालोर जिले के जसवंतपुरा क्षेत्र के गांव मांडोली में विक्रम संवत १९४९ आषाढ़ सुदी पूर्णिमा के शुभ दिन अहिंसा एवं तप बल के महामानव दादा गुरु श्री धर्म विजयी महाराज का जन्म हुआ। दादा गुरु का संसारिक नाम कोलाजी था तथा आफ पिताश्री का नाम दरजोजी था एवं जाति रेबारी (देवासी) पिता की मृत्यु होने के बाद परिवार निर्वाह का भार कोलोजी पर आ गया। बचपन से ही भगवद् भक्ति में श्रद्धावनत कोलोजी के जीवन निर्वाह का एकमात्र साधन पशुपालन ही था। एक बार मारवाड़ की वसुधा पर भयंकर अकाल पड़ा, तब कोलोजी अपने परिवार सहित दक्षिण की ओर कुच कर गए।
    रास्ते में अधिकतर पशु काल-कवलित हो गये तथा परिवार में कोलोजी स्वयं व उनका एक पुत्र वेलजी ही जीवित रहे। घूमते-फिरते वे पूना के समीप चोक नामक गांव में पहुंचे, वहां पर मारवाड़ के थर गांव के निवासी जसाजी नामक जैन रहते थे। कोलोजी न अपने पुत्र के साथ उनके यहां पशुओं की सार-संभाल के लिए नौकरी शुरू कर ली। एक बार उनके पुत्र वेलजी को जंगल में सर्प के काट लिया। उस समय कोलोजी ईश्वर ध्यान में मग्न थे। ध्यान से जब जागे तो उन्होंने अपने पुत्र को मृत्यू की शरण में पाया। पुत्र को गोद में लेकर उन्होंने दृढ़ प्रतिज्ञा की कि यदि मेरा पुत्र बच जाएगा तो ही में अन्न-जल ग्रहण करुंगा, नहीं तो परमेष्ठी मंत्र का ध्यान करते हुए यह शरीर छोड़ दूंगा। दृढ़ प्रतिज्ञा को लेकर उपवास के तीसरे दिन श्रद्धा के प्रबल प्रताप से ही कोई संत-महात्मा प्रकट हुए और पुत्र को महात्मा के चरणों में रख दिया तथा कहा कि आपने इसको जीवन दान दिया है इसके लिए में आपका ऋणी हूं। मुझे शेष जीवन भगवद् भक्ति से बिताना है, इसलिए कृपा कर बताइये कि मुझे इस पुत्र की क्या व्यवस्था करनी चाहिए? यह सुन महात्मा ने काहा कि इस पुत्र को किसी साधु या यति को बोहरा देना और तुम भी जैन दीक्षा अंगीकार कर लेना। इससे आत्म ज्ञान संपादन कर तुम एक महापुरूष कहलाओंगे। बाद में कोलोजी ने तीन उपवास का प्रारणा किया। कुछ माह बाद उन्होंने अपने पुत्र वेलजी को एक यति को बोहरा दिया, जो मंडार गांव में वेलजी यति के नाम से प्रसिद्ध हुए। इसके बाद कोलोजी को मणि विजयजी नामक जैन साधु मिले। उनके पास उन्होंने १९७३ की माघ शुक्ला पंचमी के दिन दीक्षा ग्रहण की, तभी से उनके नाम मुनि महाराज श्री धर्म विजयजी रखा गया तथा युगों-युगों तक महापुरूष के रूप में पूज्य हो गए। खंडाला घाट, मुंबी और पूना के बीच आपने लंबे समय तक ध्यानावस्था में व्यतीत किए। बाद में खंडाला घाट में ध्यान कर अपने जन्म स्थान मांडोली पधारे तथा कुछ समय पश्चात ही आत्म ज्ञान की प्राप्ति हुई। बाद में खंडाला घाट में ध्यान कर अपने जन्म स्थान मांडोली पधारे तथा कुछ समय पश्चात ही आत्म ज्ञान की प्राप्ति हुई |

    कोलोजी न अपने पुत्र के साथ उनके यहां पशुओं की सार-संभाल के लिए नौकरी शुरू कर ली। एक बार उनके पुत्र वेलजी को जंगल में सर्प के काट लिया। उस समय कोलोजी ईश्वर ध्यान में मग्न थे। ध्यान से जब जागे तो उन्होंने अपने पुत्र को मृत्यू की शरण में पाया। पुत्र को गोद में लेकर उन्होंने दृढ़ प्रतिज्ञा की कि यदि मेरा पुत्र बच जाएगा तो ही में अन्न-जल ग्रहण करुंगा, नहीं तो परमेष्ठी मंत्र का ध्यान करते हुए यह शरीर छोड़ दूंगा। दृढ़ प्रतिज्ञा को लेकर उपवास के तीसरे दिन श्रद्धा के प्रबल प्रताप से ही कोई संत-महात्मा प्रकट हुए और पुत्र को महात्मा के चरणों में रख दिया तथा कहा कि आपने इसको जीवन दान दिया है इसके लिए में आपका ऋणी हूं। मुझे शेष जीवन भगवद् भक्ति से बिताना है, इसलिए कृपा कर बताइये कि मुझे इस पुत्र की क्या व्यवस्था करनी चाहिए? यह सुन महात्मा ने काहा कि इस पुत्र को किसी साधु या यति को बोहरा देना और तुम भी जैन दीक्षा अंगीकार कर लेना। इससे आत्म ज्ञान संपादन कर तुम एक महापुरूष कहलाओंगे। बाद में कोलोजी ने तीन उपवास का प्रारणा किया। कुछ माह बाद उन्होंने अपने पुत्र वेलजी को एक यति को बोहरा दिया, जो मंडार गांव में वेलजी यति के नाम से प्रसिद्ध हुए। इसके बाद कोलोजी को मणि विजयजी नामक जैन साधु मिले। उनके पास उन्होंने १९७३ की माघ शुक्ला पंचमी के दिन दीक्षा ग्रहण की, तभी से उनके नाम मुनि महाराज श्री धर्म विजयजी रखा गया तथा युगों-युगों तक महापुरूष के रूप में पूज्य हो गए। खंडाला घाट, मुंबी और पूना के बीच आपने लंबे समय तक ध्यानावस्था में व्यतीत किए। बाद में खंडाला घाट में ध्यान कर अपने जन्म स्थान मांडोली पधारे तथा कुछ समय पश्चात ही आत्म ज्ञान की प्राप्ति हुई। बाद में खंडाला घाट में ध्यान कर अपने जन्म स्थान मांडोली पधारे तथा कुछ समय पश्चात ही आत्म ज्ञान की प्राप्ति हुई | मुनि श्री धर्मविजयजी ने विक्रम संवत् १९४९ के श्रावण वदी ६ के दिन नश्वर देह का त्याग किया। अग्नि संस्कार के समय पालकी के चारों ओर नीम के खूंटे रोपे। इस दिन महापुरूष के स्वर्गालोक पधारने पर इंद्रदेव जमकर बरसे। आग स्वतः ही आफ दाहिने पैर के अंगुठे से प्रकट हुई। शरीर के ऊपर के उपकरण ध्वजा व चारों खूंटे यथावत रहे तथा नश्वर देह जलकर भस्म हो गई। ये नीम के चारों खूंटे चार विशाल हरे नीम के वृक्ष बने। मांडोली में दाह-संस्कार वाले स्थान पर गुरूश्री की देवली बनाकर चरण पादुकाएं स्थापित की गई। श्री विजयशांति सुरीश्वरजी को आत्मज्ञान प्राप्ति पर एक वृक्ष स्वतः ही अदृश्य हो गया तथा अब नीम के शेष रहे तीन वृक्ष विद्यमान हैं। ऐतिहासिक वक्षों के बीच दादा गुरूजी की भव्य देवली शोभायमान है, जो कलयुगी मानव को ज्ञान एवं भक्ति को संदेश दे रही हैं।