श्री हस्तिनापुर तीर्थ / Shree Hastinapur Tirth: All the four Kalyanakas of...

    श्री हस्तिनापुर तीर्थ / Shree Hastinapur Tirth: All the four Kalyanakas of Bhagawan Shantinath, Kunthunath, Arnath sulsequae to Bhagawan Adinath were celebrated here

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    श्री हस्तिनापुर तीर्थ / Shree Hastinapur Tirth

    मूलनायक : श्री शांतिनाथ प्रभु।
    मार्गदर्शन : यह स्थल मेरठ से ३६ कि.मी. , दिल्ली से ११० कि.मी., मुजफ्फरनगर से ६५ कि.मी. दूर है। निकटतम रेलवे स्टेशन मेरठ है, जहां से बस, टैक्सी की सभी सुविधाएं हैं। मेरठ से दिल्ली, आगरा के लिए प्रत्येक घंटे बस सेवा उपलब्ध है। मेरठ के भैंसाली रोडवेज बस अड्डे से प्रत्येक घंटे बस हस्तिनापुर क्षेत्र के लिए प्रात: ७ बजे से रात्रि ८.३० बजे तक जाती है। क्षेत्र से प्रात: ५.१५ बजे से आधे-आधे घंटे के अंतराल से मेरठ व दिल्ली की बसें उपलब्ध रहती हैं। यहां से श्री तिजारा के लिए प्रात: ६.१५ बजे बस जाती हैं।
    परिचय : पावन तीर्थ श्री हस्तिनापुर का धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व है। यहां आदि तीर्थंकर प्रभु आदिनाथ जी के वर्षीतप पारणे का यह मूल स्थल है। यहां प्रभु ने श्रेयांसकुमार के हाथों से इक्षुरस ग्रहण का ४०० दिवसीय महान तपका पारणा किया था। श्री शांतिनाथ, श्री कुंथुनाथ, श्री अरनाथ प्रभु के च्यवन, जन्म, दीक्षा व केवलज्ञान, कुल १२ कल्याणकों की यह पावन भूमि है। भगवान मल्लीनाथ के समवसरण की पुण्य स्थली भी यहीं है। मुनिसुव्रत स्वामी, भगवान पार्श्वनाथ एवं महावीर स्वामी द्वारा देशना यहीं दी गयी थी। यहां पूजा का समय सायं ५ बजे तक है। प्रात: ८ बजे प्रक्षाल होता है। निकट ही स्थित दिगंबर मंदिर में पूजा का समय प्राय: ७ बजे है। यहां क्षेत्र पर ऐतिहासिक कैलाश पर्वत रनचा का कार्य निर्माणाधीन है। १३१ फुट ऊंचे पर्वत पर २१ फुट ऊंची भगवान आदिनाथ की खड़गासन की मनोहारी प्रतिमा ५७ फुट ऊंचे शिखर वाले मंदिर में स्थापित की जाएगी। मंदिर के निकट जम्बू द्वीप, शांतिनाथ जी, कुंथुनाथजी, अरहनाथजी के तप के चरण चिन्ह भी अत्यंत दर्शनीय है |
    ठहरने की व्यवस्था : यहां धर्मशाला तथा भोजनशाला की सुविधा है।
    पेढ़ी : जैसलमेर लोद्रवपुर पार्श्वनाथ जैन श्वेतांबर ट्रस्ट
    जैन भवन, जैसलमेर (राजस्थान)
    फोन : ०२९९२-५२४०४
    दर्शनीय स्थल : जैसलमेर भारत के थार (मृतक आवास) के नाम से प्रसिद्ध है। यहां चारों ओर बालू ही बालू नजर आती है। ११५६ में रावल जैसल ने लोद्रवा से राजपाठ यहां लाकर शहर की स्थापना की। इसके संस्थापक जैसल के नाम पर ही शहर का नाम जैसलमेर पड़ा है। लोद्रवा के रास्ते ६ कि.मी. जाने पर मरुभूमि में मरु-उद्यान सागर व जैन मंदिर है। लोद्रवा में किवदंतियों से घिरे राज प्रसाद मायामहल के ध्वंसावशेष आज भी मूमल-महेन्द्र की प्रेम कहानियां सुनाते हैं। यह प्रासाद अनुपम कारीगरी व सौन्दर्य का प्रतीक है। यहां जैन मंदिर में कल्पतरु वृक्ष है। जहां मनोकामना की पूर्ति के अलावा भाग्यवान पर्यटक हर सांझ खाई से निकल कर नागराज के दूध पीने के चमत्कारिक दृश्य को देख सकते हैं। जैसलमेर से लोद्रवा के लिए बस सेवा भी है। लोद्रवा के मार्ग में ही जैसलमेर से ७ कि.मी. दूर बड़ा बाग की प्रसिद्धि पत्थर की सुंदर कलाकृतिय के लिए है। उस मार्ग में ९ कि.मी. जाने पर ३०२५ वर्ग कि.मी. में पसरे डेजर्ट नेशनल पार्क में बास्टर्ड पक्षी, चिकारा, गैजल, सियार आदि देख लिए जा सकते हैं। पार्क में प्रवेश के लिए अनुमति व प्रवेश शुल्क देना पड़ता है। नेशनल पार्क में ठहरने की भी व्यवस्था है। सर्दी की अधिकता होने के बावजूद यात्रा का मनोरम मौसम अक्टूबर से मार्च है। राजस्थान के हर शहर की भांति जैसलमेर भी दुर्ग के आसपास ही बसा है। निर्माण काल के हिसाब से यह द्वितीय प्राचीनतम दुर्ग है और चित्तौड़ के बाद इसी का नाम आता है। दुर्ग में १२-१५ वीं शताब्दी के ८ जैन और ४ हिदू मंदिर हैं-देव विग्रह, नृत्यरता मूर्ति तथा पौराणिक आख्यानों से अलंकृत हैं ये मंदिर। दुर्ग में करीब तीन हजार व्यक्ति निवास करते हैं। १८वीं शताब्दी की पांच तल्ले पाली पटवान की हवेली की जाफरी की कला उत्कृष्ट अनुपम है। १९वीं शताब्दी के अंतिम चरण में तत्कालीन एक प्रधानमंत्री का मकान नथमलजी की हवेली दो कारीगर भाइयों की कला-नैपुण्य का उत्कृष्ट नमुना है। जैसलमेर का एक और आकर्षण फरवरी में पूर्णिमा को होने वाला ३ दिवसीय मरु-उत्सव है। विभिन्न प्रकार के नृत्यों की ताल गीतों के लय पर जैसलमेर झूम उठता है। उत्सव-काल में दूरदराज के गांवों से ग्रामीण अपनी परंपरागत पोशाकों में उत्सव का आनंद लेने आते हैं। हस्तशिल्पकी वस्तुओं की खरीद-बिक्री होती है। रेलवे स्टेशन पार कर शहर में प्रवेश करते ही राजस्थान टूरिज्म का मूमल होटल है। आधा कि.मी. जाने पर बस स्टैंड पार करते ही बाजार तथा शहर है।