श्री गिरनार तीर्थ / Shree Girnar Tirth: This place is sacred &...

    श्री गिरनार तीर्थ / Shree Girnar Tirth: This place is sacred & pious as it is related with 3 Kalyanka – (i) Diksha (ii) Gyan (iii) Moksha of 22nd Teerthankar Bhagwan Neminath.

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    श्री गिरनार तीर्थ / Shree Girnar Tirth

    मूलनायक : श्री नेमिनाथ भगवान, श्यामवर्ण पद्मासनस्थ ।
    मार्गदर्शन : यह तीर्थ शत्रुंजय (पालीताना) तीर्थ स्थान से लगभग २३१ किलोमीटर, तथा राजकोट से लगभग २३१ किलोमीटर, तथा राजकोट से १०७ किलोमीटर दूरी पर स्थित है। पालीताना से सिहोर, धोला, ढसा, जेतलसर इस रेलमार्ग से जूनागढ़ जा सकते है। अपनी बस द्वारा जाने वाले यात्रीगण तलाजा, दाठा, महुआ, अहरा, ऊना, दीव, चंद्र प्रभास पाटण, सासन गिर इन स्थानों की यात्रा करते हुए गिरनार जा सकते हैं। यह स्थान जूनागढ़ शहर के पास है। जूनागढ़ शहर से गिरनार तलहटी ६ किलोमीटर है। जूनागढ़ से टैक्सी, ऑटोरिक्शा आदि उपलब्ध रहते हैं। यहां से वनस्थली १५ कि.मी., सक्करबाग ५ कि.मी. सोमनाथ १०० कि.मी., अजारा पार्श्वनाथ २०० कि.मी. है। जूनागढ़ के लिए अहमदाबाद, सोमनाथ, राजकोट, सासनगिरी, वेरावल सभी स्थानों से ट्रेनों की सुविधा है। पालीताना, सोमनाथ, ऊना, दीव के लिए जूनागढ़ से प्रत्येक घंटे बस सेवा उपलब्ध है। शहर में टैक्सी, ऑटो रिक्शा तथा तांगा की सुविधा है।
    परिचय : सौराष्ट्र में श्री शत्रुंजय तीर्थ की तरह श्री गिरनार तीर्थ का भी बहुत बड़ा महत्व है। यह तीर्थ स्थान सुंदर, सुरम्य, नैसर्गिक वातावरण से घिरा हुआ है। इस स्थान पर भगवान नेमिनाथ की दीक्षा, केवलज्ञान, मोक्ष यह तीन कल्याणक सम्पन्न हुए। यहीं पर स्थनेमि, राजीमती तथा अन्य कईयों को मोक्ष प्राप्ति हुई। यह तीर्थ स्थान १९९८ मीटर ऊंचाई पर स्थित है। तलहटी से लगभग ४२०० सीढ़यां लगभग (४००० फीट) चढ़ने पर यहां की प्रमुख नेमिनाथ भगवान की टूँक आती है। देरासर तक सीढ़यां गयी हैं। यात्रीगण की सुविधा के लिए यहां पर सीढ़यां बनी हुई हैं। रास्ते में जगह-जगह विश्राम स्थान तथा पानी की व्यवस्था की गई है। इस चढ़ाई में तलहटी से लगभग २.३० घंटे लग जाते हैं। इस पहाड़ पर पैदल चढ़ने में असमर्थ यात्रियों के लिए डोली की सुविधा है। यहां पहाड़ की ५ चोटियों पर ५ मंदिर हैं। पूजा का समय प्रात: ९.३० बजे है। दिगंबर समाज द्वारा पूजा ७ से ९ बजे तक की जाती है।
    श्री नेमिनाथ भव्य मंदिर : पहले यह मंदिर लकड़ी का बना हुआ था। बाद में यह जीर्ण होने के कारण विक्रम संवत् ६०९ में काश्मीर के धर्मनिष्ठ श्रावक अजितशाह और रत्नाशाह ने उनका जीर्णोद्धार किया। १२वीं शताब्दी में फिर इसका जीर्णोद्धार हुआ।
    कुमारपाल महाराज की टूँक : गुजरात के महाराज कुमारपाल कलिकाल सर्वज्ञ श्री हेमचंद्रचार्य की प्रेरणा से १४४४ मंदिरों की निर्मिती की। इस तीर्थ पर भी उन्होंने कलापूर्ण जिनालय बनाया है। इस मंदिर का जीर्णोद्धार मागरोल निवासी सेठ धर्मजी हेमचंद ने किया।
    पस्तुपाल – तेजपाल की टूँक : यहां पर मेरठ वसही टूँक, संग्राम महाराज टूँक, संप्रति महाराज टूँक आदि जैन मंदिर भी हैं। इस पहाड़ पर दामोदर कुंड, रेवती कुंड, भीम कुंड, गजपद कुंड आदि पानी के कुछ कुंड भी हैं। जिनका पानी बहुत मीठा है।
    अंबाजी की टूँक : भगवान नेमिनाथ के इस प्रमुख टूँक के दर्शन कर आगे जाते हुए रथनेमि का मंदिर आता है, जो नेमिनाथ के भाई थे। उन्होंने यहां पर तपश्चर्या कर मोक्ष प्राप्ति की। उसके आगे जाने पर अंबाजी की टूँक आती है।
    अंबाजी भगवान नेमिनाथ की अधिष्टायिका देवी हैं। यहां पर श्वेताम्बर समाज की तरह दिगम्बर समाज के भी मंदिर हैं। विवाह के बाद भक्तजन अंबाजी के मंदिर में कपड़ा बांधने आते हैं और मंगल वैवाहिक सुख की कामना करते हैं। तलहटी में स्थित एक शिवमंदिर भी दर्शनीय है।
    ठहरने की व्यवस्था : यात्रियों के लिए यहां तलहटी में ही कई धर्मशालाएं हैं। जहां ओढ़ने-बिछाने का सामान मिलता है। दिगंबर समाज की भी यहां धर्मशाला है। जूनागढ़ ठहरकर यहां आना भी सुविधाजनक है। जूनागढ़ एवं तलहटी में भोजनशाला है। श्री वन्दीलाल दिगंबर जैन धर्मशाला जूनागढ़ में है। श्री देवचंद लक्ष्मीचंद ब्लॉक तलहटी में है। तलहटी में ही श्री नेमिजिन धर्मशाला है।