श्री देलवाड़ा तीर्थ / Shree Abu Dilwara Tirth: These Jain temples were...

    श्री देलवाड़ा तीर्थ / Shree Abu Dilwara Tirth: These Jain temples were built by Vastupal-Tejpal, these beautiful five legendary marble temples of Dilwara are a sacred pilgrimage place of the Jains

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    श्री देलवाड़ा तीर्थ / Shree Abu Dilwara Tirth

    देलवाड़ा का अद्भूत कलात्मक सौंदर्य हमें दुसरी दुनिया में ले जाता है। शिल्प सौंदर्य का एक उत्कृष्ट नमूना हमें आबु के देलवाड़ा के जैन मन्दिरों में देखने को मिलता है। अहमदाबाद – दिल्ली मार्ग पर आबु रोड रेल्वे स्टेशन है। यह स्थान गुजरात – राजस्थान की सीमा पर है। रेल्वे स्टेशन से लगभग २३ कि.मी. दुरी पर शहर से ४ कि.मी. दूर आबू पहाड़ का अनन्य आकर्षण आम्रकुंजों में रमा हुआ देलवाड़ा है। आबु में विश्वविख्यात देलवाड़ा मन्दिर है। पूर्वकाल में लोग पगडण्डी या ऐसे कोई छोटे-मोटे रास्ते से ऊपर जाते थे अब पर्वत पर जाने के लिए अच्छी सड़क बनायी गयी है। पहाडो में टेढ़ा-मेढ़ा घूमता हुआ यह रास्ता आबु पर्वत तक ले जाता है। देलवाड़ा में कुल पांच जैन मन्दिर है। सारे विश्व में इतनी सुन्दर शिल्पकला का दूसरा मन्दिर नहीं है। विमलवसही मन्दिर का सबसे आकर्षक भाग रंगमंडप है। यह एक भव्य, खुला मंडप है, जिसमें ४८ कलायुक्त स्तम्भ है। प्रत्येक दो स्तंभ आपस में अलंकृत तोरणों द्वारा जुड़े हैं। मंडप के बीचोंबीच एक लटकता हुआ आकर्षक झुमका है। इसके बाद गोलाकार मालाओं में पशु-पक्षी, देवी-देवता इत्यादि बने हैं। इन मालाओं पर आधारित १६ स्तंभों पर १६ विद्या देवियों की मूर्तियां हैं। जिनके हाथों में विभिन्न अस्त्र-आयुध सुशोभित हैं। रंगमंडप के आसपास की छतों पर सरस्वतीदेवी, लक्ष्मीदेवी, भरत-बाहुबली के युद्ध का दृश्य, अयोध्या एवं तक्षशिला नगरी, राजदरबार का दृश्य आदि अलंकृत है। विमलवसही और लुणवसही इन दोनों मन्दिरों में काफी समानता है।

    विमलवसही मन्दिर में मूलनायक श्री आदीश्वर भगवान है और लुणवसही में मूलनायक श्री नेमिनाथ भगवान हैं। दोनो मन्दिरों में ५२ देरीयां हैं जिसमें तीर्थंकरों की प्रतिमाएं स्थापित की गयी हैं इन देरीयों के सामने बाहर जो प्रांगण है, वहां से प्रदक्षिणा शुरू होता है। प्रदक्षिणा के छतों पर आकर्षक शिल्पकला की गयी है। जैन तीर्थंकरों के चरित्र के कुछ जीवन प्रसंग, उनका पंचकल्याणक महोत्सव, फूल-पत्तियां, पशु-पक्षी, नाटक, संगीत आदि के सुन्दर शिल्प यहां पर है। दोनों मन्दिरों में हाथीशाला है, जिसमें संगमरमर के १०-१० हाथी हैं। भगवान की पूजा करने वाले जैनश्रावकों के लिए सुबह १२ बजे तक का समय रखा गया है। पर्यटकों के लिए श्रद्धा के ये द्वार दोपहर १२.०० से सायं ६.०० बजे तक खुले रहते हैं। लुणवसही मन्दिर के दायीं तरफ एक छोटे बगीचे में दादासाहब की पगलियां बनी हैं और बायी तरफ एक कीर्तिस्तंभ है, जो अधूरा-सा प्रतीत होता है। इनके अतिरिक्त दो और मन्दिर हैं। पहला पित्तलहर जो महाराणा सांगा के किलेदार भामाशाह ओसवाल ने १५वीं शताब्दी में बनवाया। मन्दिर में श्री आदिनाथ भगवान की धातू की विशाल मूर्ति है। दूसरा मन्दिर खरतरवसही है, जिसमें मूलनायक श्री पार्श्वनाथ भगवान हैं। इस मन्दिर को शिल्पियों का मन्दिर भी कहते हैं। यहां का कारोबार देखने वाले मन्दिर की पेढ़ी का नाम सेठ कल्याणजी परमानंदजी पेढ़ी है। मन्दिर के बाहर सड़क की दूसरी ओर दो बड़ी धर्मशालाएं हैं, जहा यात्रियों की निवास की सभी सुविधा है। यात्रियों के लिये कुछ दूरी पर कुछ नये ब्लॉक भी बने हैं।